हरिद्वार के औद्योगिक क्षेत्रों में दवा निर्माण करने वाली कंपनियों के सैंपल गुणवत्ता जांच में फेल होने के मामले सामने आ रहे हैं। सितंबर माह के ड्रग अलर्ट में भगवानपुर, रुड़की और सिडकुल की फार्मा कंपनियां शामिल हैं। इनमें ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन, रैबेप्राजोल टैबलेट, खांसी का सिरप और लॉराज़ेपम टैबलेट के सैंपल भी शामिल बताए गए हैं। ऐसे में बड़ा सवाल है कि आखिर बार-बार दवाओं के सैंपल फेल क्यों हो रहे हैं और इन खामियों को रोकने के लिए औषधि विभाग क्या कदम उठा रहा है? यदि नियमित और प्रभावी निरीक्षण किया जा रहा है, तो दवाओं की गुणवत्ता में लगातार कमियां क्यों मिल रही हैं? क्या निर्माण प्रक्रिया और गुणवत्ता जांच की पर्याप्त निगरानी हो रही है या निरीक्षण केवल औपचारिकता तक सीमित हैं? इन मामलों में संबंधित कंपनियों की भूमिका और विभागीय निगरानी की समीक्षा जरूरी है। हालांकि, किसी भी मिलीभगत या लापरवाही की पुष्टि निष्पक्ष जांच के बाद ही हो सकती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब दवाओं के सैंपल फेल होने के मामले सामने आते हैं, तो उसके बाद क्या कार्रवाई होती है? नियमानुसार, सैंपल फेल होने पर संबंधित बैच की जांच, बिक्री और वितरण की स्थिति का पता लगाने तथा आवश्यकतानुसार बिक्री रोकने या बाजार से बैच वापस मंगवाने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। गंभीर मामलों में कंपनी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई और लाइसेंस से जुड़ी कार्रवाई भी संभव है। लेकिन क्या हर मामले में कार्रवाई अपने अंजाम तक पहुंचती है? क्या कंपनियों से जवाब मांगा जाता है, दोबारा निरीक्षण होता है और खामियों के लिए जिम्मेदारी तय की जाती है? औषधि विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को स्पष्ट करना चाहिए कि इन मामलों में कितनी जांच हुई, कितने मामलों में कार्रवाई की गई और कितनी कंपनियों को जवाबदेह ठहराया गया। सवाल केवल सैंपल फेल होने का नहीं, बल्कि उसके बाद होने वाली कार्रवाई और भविष्य में ऐसी खामियों को रोकने का भी है। आखिर मरीजों की सेहत से जुड़े इस मामले में जवाबदेही कब तय होगी?
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